देखो-देखो यह जीव की, विराधना का फल। चेतो-चेतो आराधना में, मत बनो निर्बल ॥टेक।। पाषाण खण्ड कह रहे, कठोरता त्यागो। विनम्र हो उत्साह से, शिवमार्ग में लागो।। बहते हुए झरने कहें, धोओ मिथ्यात्व मल ।।देखो-देखो…॥१॥ ईर्ष्या त्यागो जलती हुई, अग्नि है कह रही। मत चाह दाह में जलो, सुख अन्तर में सही ।। वायु कहे भ्रमना वृथा, होओ निज में निश्चल ।।देखो-देखो…।।२।। जड़ता छोड़ो प्रमाद को नाशो कहें तरुवर । शुद्धातमा ही सार है, उपदेश दें गुरुवर ।। समझो-समझो निजात्मा, अवसर बीते पल-पल ।।देखो-देखो…।।३।। मायाचारी संक्लेशता का, फल कहें तिर्यंच। जागो अब मोह नींद से, छोड़ो झूठे प्रपञ्च।। जिनधर्म पाया भाग्य से, दृष्टि करो निर्मल ।।देखो-देखो…।।४।। श्रृंगार अरु भोगों की रुचि का, फल कहती नारी। कंजूसी पूर्वक संचय का, फल कहते भिखारी ।। बहु आरम्भ परिग्रह फल में, नारकी व्याकुल ।।देखो-देखो… ॥५॥ असहाय शक्ति हीन, देखो दरिद्री रोगी। कोइ इष्ट वियोगी, कोई अनिष्ट संयोगी। घिनावना तन रूप, अंगोपांग है शिथिल ।।देखो-देखो…॥६॥ यदि ये दु:ख इष्ट नहीं हैं, तो निज भाव सुधारो। निव...
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