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Showing posts with the label रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

चेतो-चेतो आराधना में | Cheto Cheto Aaradhana me

देखो-देखो यह जीव की, विराधना का फल। चेतो-चेतो आराधना में, मत बनो निर्बल ॥टेक।। पाषाण खण्ड कह रहे, कठोरता त्यागो। विनम्र हो उत्साह से, शिवमार्ग में लागो।। बहते हुए झरने कहें, धोओ मिथ्यात्व मल ।।देखो-देखो…॥१॥ ईर्ष्या त्यागो जलती हुई, अग्नि है कह रही। मत चाह दाह में जलो, सुख अन्तर में सही ।। वायु कहे भ्रमना वृथा, होओ निज में निश्चल ।।देखो-देखो…।।२।। जड़ता छोड़ो प्रमाद को नाशो कहें तरुवर । शुद्धातमा ही सार है, उपदेश दें गुरुवर ।। समझो-समझो निजात्मा, अवसर बीते पल-पल ।।देखो-देखो…।।३।। मायाचारी संक्लेशता का, फल कहें तिर्यंच। जागो अब मोह नींद से, छोड़ो झूठे प्रपञ्च।। जिनधर्म पाया भाग्य से, दृष्टि करो निर्मल ।।देखो-देखो…।।४।। श्रृंगार अरु भोगों की रुचि का, फल कहती नारी। कंजूसी पूर्वक संचय का, फल कहते भिखारी ।। बहु आरम्भ परिग्रह फल में, नारकी व्याकुल ।।देखो-देखो… ॥५॥ असहाय शक्ति हीन, देखो दरिद्री रोगी। कोइ इष्ट वियोगी, कोई अनिष्ट संयोगी। घिनावना तन रूप, अंगोपांग है शिथिल ।।देखो-देखो…॥६॥ यदि ये दु:ख इष्ट नहीं हैं, तो निज भाव सुधारो। निव...

दशलक्षण धर्म का मर्म | Daslakshan dharm ka marm

क्षमा भाव अविकार, स्वाश्रय से प्रकटे सुखद। आनन्द अपरम्पार, शत्रु न दीखे जगत में ।।१।। मार्दव भाव सुधार, निज रस ज्ञानानंद मय। वेदूँ निज अविकार, नहीं मान नहीं दीनता ।।२।। सरल स्वभावी होय, अविनाशी वैभव लहूँ। वांछा रहे न कोय, माया शल्य विनष्ट हो ॥३॥ परम पवित्र स्वभाव, अविरल वर्ते ध्यान में। नाशे सर्व विभाव, सहजहि उत्तम शौच हो ।।४।। सत्स्वरूप शुद्धात्म, जानूँ, मानूँ, आचरूँ। प्रकटे पद परमात्म, सत्य धर्म सुखकार हो ॥५॥ संयम हो सुखकार, अहो अतीन्द्रिय ज्ञानमय । उपजे नहीं विकार, परम अहिंसा विस्तरे ।।६।। निज में ही विश्राम, जहाँ कोई इच्छा नहीं। ध्याऊँ आतमराम, उत्तम तप मंगलमयी ।।७।। परभावों का त्याग, सहज होय आनन्दमय। निज स्वभाव में पाग, रहूँ निराकुल मुक्त प्रभु ।।८।। सहज अकिंचन रूप, नहीं परमाणु मात्र मम्। भाऊँ शुद्ध चिद्रूप, होय सहज निर्ग्रंथ पद ।९।। परम ब्रह्म अम्लान, ध्याऊँ नित निर्द्वन्द्व हो। ब्रह्मचर्य सुख खान, पूर्ण होय आनंदमय ।।१०।। एक रूप निज धर्म, दशलक्षण व्यवहार से। स्वाश्रय से यह मर्म, जाना ज्ञान विरागमय ।।११।। Artist - ...

ज्ञानाष्टक । Gyanashtak

निरपेक्ष हूँ कृतकृत्य मैं, बहु शक्तियों से पूर्ण हूँ। मैं निरालम्बी मात्र ज्ञायक, स्वयं में परिपूर्ण हूँ। पर से नहीं सम्बन्ध कुछ भी, स्वयं सिद्ध प्रभु सदा। निर्बाध अरु नि:शंक निर्भय, परम आनन्दमय सदा ।।१।। निज लक्ष से होऊँ सुखी, नहिं शेष कुछ अभिलाष है। निज में ही होवे लीनता, निज का हुआ विश्वास है। अमूर्तिक चिन्मूर्ति मैं, मंगलमयी गुणधाम हूँ मेरे लिए मुझसा नहीं, सच्चिदानन्द अभिराम हूँ॥२।।। स्वाधीन शाश्वत मुक्त अक्रिय अनन्त वैभववान हूँ। प्रत्यक्ष अन्तर में दिखे, मैं ही स्वयं भगवान हूँ॥ अव्यक्त वाणी से अहो, चिन्तन न पावे पार है। स्वानुभव में सहज भासे, भाव अपरम्पार है ।।३।। श्रद्धा स्वयं सम्यक् हुई, श्रद्धान ज्ञायक हूँ हुआ। ज्ञान में बस ज्ञान भासे, ज्ञान भी सम्यक् हुआ। भग रहे दुर्भाव सम्यक्, आचरण सुखकार है। ज्ञानमय जीवन हुआ, अब खुला मुक्ति द्वार है ।।४।। जो कुछ झलकता ज्ञान में, वह ज्ञेय नहिं बस ज्ञान है। नहिं ज्ञेयकृत किंचित् अशुद्धि, सहज स्वच्छ सुज्ञान है। परभाव शून्य स्वभाव मेरा, ज्ञानमय ही ध्येय है। ज्ञान में ज्ञायक अहो, मम ज्ञानमय ही ज्ञेय है ॥५॥ ज्ञान ही साधन, सह...