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Showing posts with the label श्री सुमतिनाथ - Shri Sumatinath Ji

Shri Sumatinatha Bagwaan | श्री सुमतिनाथ भगवान

परिचय भगवान सुमतिनाथ ( Sumatinath) जी वर्तमान काल के पांचवें तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का अर्थ होता है जो तीर्थ की रचना करें, जो संसार सागर(जन्म मरण के चक्र) से मोक्ष तक के तीर्थ की रचना करें, वह तीर्थंकर कहलाते हैं। सुमतिनाथ स्वामी का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में चैत्र शुक्ल ११ को हुआ था। अयोध्या में जन्मे सुमतिनाथ जी की माता सुमंगला और पिता मेघरथ थे। पूर्व जन्म धातकीखंडद्वीप में मेरूपर्वत से पूर्व की ओर स्थित विदेहक्षेत्र में सीता नदी के उत्तर तट पर पुष्कलावती नाम का देश है। उसकी पुंडरीकिणी नगरी में रतिषेण नाम का राजा था। किसी दिन राजा ने विरक्त होकर अपना राज्य पुत्र को देकर अर्हन्नन्दन जिनेन्द्र के समीप दीक्षा लेकर ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि कारणों से तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके वैजयन्त विमान में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया। गर्भ और जन्म वैजयन्त विमान से च्युत होकर वह अहमिन्द्र इसी भरतक्षेत्र के अयोध्यापति मेघरथ की रानी मंगलावती के गर्भ में आया, वह दिन श्रावण शुक्ल द्वितीया का था। तदनन्तर चैत्र माह की शुक्ला एकादशी के दिन माता ने सुमतिनाथ तीर्थंकर को जन्म ...

श्री सुमतिनाथ जी जिन पूजा - Shree Sumtinaath ji jin pooja

संजम रतन विभूषन भूषित, दूषन वर्जित श्री जिनचन्द | सुमति रमा रंजन भवभंजन, संजययंत तजि मेरु नरिंद || मातु मंगला सकल मंगला, नगर विनीता जये अमंद | सो प्रभु दया सुधा रस गर्भित आय तिष्ठ इत हरो दुःख दंद |1| ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः | ॐ ह्रीं श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् |   पंचम उदधितनों सम उजज्वल, जल लीनों वरगंध मिलाय | कनक कटोरी माहिं धारि करि, धार देहु सुचि मन वच काय || हरिहर वंदित पापनिकंदित, सुमतिनाथ त्रिभुवनके राय | तुम पद...

चालीसा : श्री सुमति नाथ जी | Sumatinath Ji Chalisa

श्री सुमति नाथ करुना निर्झर, भव्य जानो तक पहुचे झर झर । नयनो में प्रभु की छवि भर कर, नित चालीसा पढ़े सब घर घर ।। जय श्री सुमति नाथ भगवान्, सबको दो सदबुद्धि दान । अयोध्या नगरी कल्याणी, मेघरथ राजा मंगला रानी ।। दोनों के अति पुण्य प्रजारे, जो तीर्थंकर सूत अवतारे । शुक्ल चैत्र एकादशी आई, प्रभु जन्म की बेला आई ।। तीनो लोको में आनंद छाया, नाराकियो ने दुःख भुलाया । मेरु पर प्रभु को ले जाकर, देव न्वहन करते हर्षाकर ।। तप्त स्वर्ण सम सोहे प्रभु तन, प्रगटा अंग प्रत्यंग में यौवन । ब्याही सुन्दर वधुएँ योग, नाना सुखो...