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Showing posts with the label श्री महावीर - Mahaveer Ji

श्री महावीर-जिन पूजा | Shree Mahavira Jin Puja

| | श्री महावीर-जिन पूजा | | (मत्त-गयंद छन्द) श्रीमत वीर हरें भव-पीर, भरें सुख-सीर अनाकुलताई  | केहरि-अंक अरीकर-दंक, नयें हरि-पंकति-मौलि सुहाई  || मैं तुमको इत थापत हूं प्रभु! भक्ति-समेत हिये हरषाई  | हे करुणा-धन-धारक देव! इहाँ अब तिष्ठहु शीघ्रहि आई  || ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र! अत्र अवतर! अवतर! संवौषट्! (इति आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ:! (इति स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव: भव: वषट्! (इति सन्निधिकरणम्) क्षीरोदधि-सम शुचि नीर, कंचन-भृंग भरूं | प्रभु वेग हरो भवपीर, यातैं धार करूं || श्री वीर महा-अतिवीर, सन्मति नायक हो | जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मति-दायक हो || ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।१। मलयागिर चंदनसार, केसर-संग घसूं | प्रभु भव-आताप निवार, पूजत हिय हुलसूं || श्री वीर महा-अतिवीर, सन्मति नायक हो | जय वर्द्धमान गुणधीर, सन्मति-दायक हो || ॐ ह्रीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्राय भवाताप-विनाशनाय चंदनं निर्वपामी...

Queen Chelna and King Shrenik | Jain Story

 This is a story from the time of Bhagwan Mahavir. At that time, king Chetak was the ruler of Vaishali and he had a beautiful daughter named Chelna. Once an artist called Bharata painted a picture of Chelna and showed it to king Shrenik of Magadh. Charmed by Chelna's beauty, Shrenik fell in love with her.  One day Chelna came to the city of Magadh where she saw king Shrenik and she also fell in love with him. They soon got married. Queen Chelna was a devoted follower of Jainism, while Shrenik was influenced by Buddhism. After marriage, she got to know that king Shrenik was not a follower of Jainism. She started crying so king asked him the reason. After a long discussion, king Shrenik gave her the permission to follow whatever she wants. She started following and promoting Jainism fearlessly. The effect of Jainism could be seen in the whole town. Some Buddhist teachers got to know this and feared what if she made the whole town Jain. They went to the king and asked him to inst...

श्री वर्धमान स्तोत्र (मुनि श्री प्रणम्य सागर जी )संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद | Vardhamaan Stotra by Muni Shri Pranamya Sagar Ji

  1. अदृश्य को दिखाने वाली स्तुति श्री वर्धमान जिनदेव पदारविन्द - युग्म-स्थितांगुलिनखांशु-समूहभासि। प्रद्योततेऽखिल-सुरेन्द्रकिरीट-कोटि: भक्त्या 'प्रणम्य' जिनदेव-पदं स्तवीमि ।।1।। वर्धमान जिनदेव युगल पद, लालकमल से शोभित है। जिनके अंगुली की नख आभा, से सबका मन मोहित है। देवो के मुकुटों की मणियाँ, नख आभा में चमक रही। उन चरणों की भक्ति से मम, मति थुति करने मचल रही। 1 । 2. चित्त एकाग्र करने वाली स्तुति नाहंकृतेऽहमिति नात्र चमत्कृतेऽपि, बुद्धे: प्रकर्षकशतो न च दीनतोऽहम्‌। श्रीवीरदेव-गुण-पर्यय-चेतनायां संलीन-मानस-वश: स्तुतिमातनोमि ।।2।। नहीं अहंकृत होकर के मैं, नहीं चमत्कृत होकर के। बुद्धि की उत्कटता से ना, नहीं दीनता मन रख के। वीर प्रभु की गुण-पर्यायों, से युत नित चेतनता में। लीन हुआ है मेरा मन यह, अतः संस्तवन करता मैं। 2 । 3. उत्कृष्ट पुण्य फल प्रदायी स्तुति उच्चै: कुल-प्रभवता सुखसाधनानि सौन्दर्य-देह-सुभग-द्रविण-प्रभूतम्‌। मन्ये न मोक्ष-पथ-पुण्यफलं प्रशस्तं यावन्न भक्तिकरणाय मन: प्रयास: ।।3।। उच्च कुलों में पैदा होना, सुख साधन सब पा लेना। सुन्दर देह भाग्य भी उत्तम, धन वैभव भी पा लेना...

श्री महावीर भगवान संछिप्त परिचय | Mahaveer Prabhu Parichay

प्रस्तावना  जैन धर्म अनादिनिधन धर्म है, जिसमें अनादिकाल से तीर्थंकरों की उत्पत्ति होना और उनके द्वारा धर्मोपदेश के माध्यम से भावी जीवों का कल्याण होता रहा है। हर काल के चौथे काल में 24 तीर्थंकरों की उत्पत्ति होती आ रही हैं इसी श्रृंखला में वर्तमान हंडाअवसर्पिणी काल के कर्म युग चतुर्थ काल में 24 तीर्थंकर हुए । प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के प्रथम पुत्र भरत चक्रवर्ती हुए जिनकी अनंतमति नामक रानी से मरीचि नामक पुत्र हुआ। जब भगवान ऋषभदेव को वैराग्य हुआ और उन्होंने दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण कर ली तब देखा देखी में चार हजार राजाओं के साथ मरीचि ने भी दिगम्बर मुनि दीक्षा धारण कर ली। प्रथम भाग:- पतन का प्रारम्भ भूख प्यास की बाधा न सहन करने के कारण चार हजार राजाओं के साथ मरीचि मुनि भी भ्रष्ट हो गए। और वे सभी तालाबों से पानी पीने लगे, जंगलों में कंद मूल फल आदि खाने लगे। तब वन देवता ने प्रकट होकर कहा यदि तुम लोग मुनि भेष में रहकर यह अनाचार करोगे तो हम तुम्हें दंडित करेंगे । देवता के वचन सुनकर मरीचि ने वृक्षों के बल्कल पहन कर दिगम्बर वेश को छोड़ दिया और मनमानी प्रवृति करने लगा तथ...