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Showing posts with the label श्री मुनिस्रुव्रतनाथ- Munisubrat Ji

आरती मुनिसुव्रत जी || Aarti Munisubrat JI

जय मुनिसुव्रतनाथ स्वामी, प्रभु मुनिसुव्रतनाथ स्वामी जय मुनिसुव्रतनाथ स्वामी, प्रभु मुनिसुव्रतनाथ स्वामी भक्ति भाव से प्रणमु तुमको, जय अन्तरयामि २ जय मुनिसुव्रतनाथ स्वामी० राजगृही में जन्म किया प्रभु २, आनन्द भयो भारी । सुर नर मुनि गुण गाये तिहारी, आरती करी थारी ॥ जय मुनि सुव्रतनाथ स्वामी० पिता तिहारे सुमित्र राजा २, शामा के जाया । श्याम वर्ण मूरत तेरी हैं, पैठण अतिशय दर्शाया ॥ जय मुनि सुव्रतनाथ स्वामी० जो ध्यावे सुख पावे सब ही २, सब संकट को दूर करे २। मंवांचित फल पावे सब ही 2, जो प्रभु चरण हरे २ ॥ जय मुनि सुव्रतनाथ स्वामी०

श्री मुनिसुव्रतनाथ जिन चालीसा || SHRI MUNISUVRATNAATH JIN CHALISA

श्री मुनिसुव्रतनाथ जिन चालीसा कविश्री चंद्र (दोहा)  अरिहंत सिद्ध आचार्य को करूँ प्रणाम । उपाध्याय सर्व-साधू करते स्व-पर-कल्याण ।। जिनधर्म जिनागम जिनमंदिर पवित्र-धाम । वीतराग की प्रतिमा को कोटि-कोटि प्रणाम ।। (चौपाई) जय मुनिसुव्रत दया के सागर, नाम प्रभू का लोक-उजागर । सुमित्रा राजा के तुम नंदा, माँ शामा की आँखों के चंदा ।।१।। श्यामवर्ण-मूरत प्रभू की प्यारी, गुणगान करें निश-दिन नर-नारी । मुनिसुव्रत-जिन हो अंतरयामी, श्रद्धा-भाव-सहित तुम्हें प्रणामी ।।२।। भक्ति आपकी जो निश-दिन करता, पाप-ताप भय-संकट हरता । प्रभु संकटमोचन नाम तुम्हारा, दीन-दु:खी जीवों का सहारा ।।३।। कोई दरिद्री या तन का रोगी, प्रभु दर्शन से होते हैं निरोगी । मिथ्या-तिमिर भयो अतिभारी, भव-भव की बाधा हरो हमारी ।।४।। यह संसार महादु:खदाई, सुख नहीं यहाँ दु:ख की खाई । मोह-जाल में फंसा है बंदा, काटो प्रभु भव भव का फंदा ।।५।। रोग-शोक-भय-व्याधि मिटावो, भवसागर से पार लगावो । घिरा कर्म से चौरासी भटका, मोह-माया-बंधन में अटका ।।६।। संयोग-वियोग भव-भव का नाता, राग-द्वेष जग में ...

श्री मुनिसुव्रत पूजन | SHRI MUNISUVRAT JIN POOJAN

SHRI MUNISUVRAT JIN POOJAN / श्री मुनिसुव्रत पूजन (मत्तगयन्द छन्द) प्रानत-स्वर्ग विहाय लियो जिन, जन्म सु राजगृही-महँ आर्इ। श्रीसुहमित्त पिता जिनके, गुनवान महा पदमा जसु मार्इ।। बीस-धनू तन श्याम छवी, कछु-अंक हरी वर वंश बतार्इ। सो मुनिसुव्रतनाथ प्रभू कहँ, थापत हूँ इत प्रीत लगार्इ।। ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतरत अवतरत संवौषट्! ( आह्वाननम् ) ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठ: ठ:! ( स्थापनम् ) ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भवत भवत वषट्! (सन्निधिकरणम्) (गीतिका) उज्ज्वल सु जल जिमि जस तिहारो, कनक-झारी में भरूं। जर-मरन-जामन-हरन-कारन, धार तुम पदतर करूं।। शिव-साथ करत सनाथ सुव्रत- नाथ मुनि-गुनमाल हैं। तसु चरन आनंदभरन तारन-तरन विरद विशाल हैं।। ॐ ह्रीं श्रीमुनिसुव्रतनाथ जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।१। भवताप-घायक शांति-दायक, मलय हरि घसि ढिंग धरूं | गुन-गाय शीस नमाय पूजत, विघन-ताप सबै हरूं।। शिव-साथ करत सनाथ सुव्रत- नाथ मुनि-गुनमाल हैं। तसु चरन आनंदभरन तारन-तरन...